मोहम्मद ने खिलाया खाना और दुनिया छोड़कर चला गया भारत का लाल-शव का पोस्टमार्टम तक नहीं कराया गया

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हाल ही में केंद्रीय सूचना आयोग ने भी आश्चर्य जताया है कि शास्त्री की मौ’त की जांच के लिए बनाई गई राजनारायण समिति से जुड़ा कोई रिकॉर्ड राज्यसभा के पास नहीं है। सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलू ने कहा कि संसद बहुत सावधानी से दस्तावेजों को सहेजने के लिए जाना जाता है, लेकिन उनका कहना है कि ऐसा महत्वपूर्ण रिकार्ड कैसे गायब हो गया।

मालूम हो कि लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु को लेकर कई तरह की बातें होती हैं। 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद में पाकिस्तान के साथ शांति समझौते पर करार के महज 12 घंटे बाद 11 जनवरी के तड़के उनकी अचानक हुई मौ’त पर सवाल आज भी अनसुलझे हैं।  हालांकि, आधिकारिक तौर पर कहा जाता है कि उनकी मौ’त दिल का दौरा पड़ने से हुई। शास्त्री को दिल से जुड़ी बीमारी पहले से थी और 1959 में उन्हें एक हार्ट अटैक आया भी था। इसके बाद उन पर उनके परिजन और दोस्त कम काम करने की सलाह देते थे। लेकिन 9 जून, 1964 को देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद उन पर काम का दबाव बढ़ता ही चला गया।

खैर, भारत-पाकिस्तान के बीच 1965 में अप्रैल से 23 सितंबर के बीच 6 महीने तक युद्ध चला। युद्ध खत्म होने के 4 महीने बाद जनवरी, 1966 में दोनों देशों के शीर्ष नेता तब के रूसी क्षेत्र में आने वाले ताशकंद में शांति समझौते के लिए रवाना हुए। पाकिस्तान की ओर से राष्ट्रपति अयूब खान वहां गए। 10 जनवरी को दोनों देशों के बीच शांति समझौता भी हो गया। लेकिन समझौते के 12 घंटे उनकी अचानक मौ’त हो गई। क्या उनकी मौ’त सामान्य थी या फिर उनकी हत्या की गई थी। कहा जाता है कि समझौते के बाद कई लोगों ने शास्त्री को अपने कमरे में परेशान हालत में टहलते देखा था। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि समझौते से वह बेहद खुश नहीं थे।

शास्त्री के साथ ताशकंद गए उनके सूचना अधिकारी कुलदीप नैय्यर ने अपनी किताब में ‘बियोंड द लाइन’ में लिखा है, “उस रात मैं सो रहा था, अचानक एक रूसी महिला ने दरवाजा खटखटाया। उसने बताया कि आपके प्रधानमंत्री की सेहत ठीक नहीं है। मैं जल्दी से उनके कमरे में पहुंचा। मैंने देखा कि रूसी प्रधानमंत्री एलेक्सी कोस्गेन बरामदा में खड़े हैं, उन्होंने इशारे से बताया कि शास्त्री नहीं रहे।

उन्होंने देखा कि उनकी चप्पल कारपेट पर रखी हुई थी जिसका प्रयोग उन्होंने नहीं किया था। पास में ही एक ड्रेसिंग टेबल था जिस पर थर्मस फ्लास्क गिरा हुआ था जिससे लग रहा था कि उन्होंने इसे खोलने की कोशिश की थी। कमरे में कोई घंटी भी नहीं थी। शास्त्री के साथ भारतीय डेलिगेशन के रूप में गए लोगों का भी मानना था कि उस रात वो बेहद असहज दिख रहे थे। दूसरी ओर, कुछ लोग दावा करते हैं कि जिस रात शास्त्री की मौ’त हुई, उस रात खाना उनके निजी सहायक रामनाथ ने नहीं, बल्कि सोवियत रूस में भारतीय राजदूत टीएन कौल के कुक जान मोहम्मद ने पकाया था। खाना खाकर शास्त्री सोने चले गए थे। उनकी मौ’त के बाद शरीर के नीला पड़ने पर लोगों ने आशंका जताई थी कि शायद उनके खाने में जहर मिला दिया गया था। उनकी मौ’त 10-11 जनवरी की आधी रात को हुई थी।

शास्त्री के पार्थिव शरीर को भारत भेजा गया। शव देखने के बाद उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने दावा कि उनकी मौ’त संदिग्ध परिस्थितियों में हुई है। अगर दिल का दौरा पड़ा तो उनका शरीर नीला क्यों पड़ गया था और सफेद चकत्ते कैसे पड़ गए। शास्त्री का परिवार उनके असायमिक निधन पर लगातार सवाल खड़ा करता रहा। 2 अक्टूबर, 1970 को शास्त्री के जन्मदिन के अवसर पर ललिता शास्त्री उनके निधन पर जांच की मांग की। बेहद चौंकाने वाली बात यह रही कि सरकार ने शास्त्री की मौ’त पर जांच के लिए एक जांच समिति का गठन करने के बाद उनके निजी डॉक्टर आरएन सिंह और निजी सहायक रामनाथ की मौ’त अलग-अलग हादसों में हो गई। ये दोनों लोग शास्त्री के साथ ताशकंद के दौरे पर गए थे। उस समय माना गया था कि इन दोनों की हादसों में मौ’त से केस बेहद कमजोर हो गया।

उनका पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया, अगर उस समय पोस्टमार्टम कराया जाता तो उनके निधन का असली कारण पता चल जाता। एक पीएम के अचानक निधन के बाद भी उनके शव का पोस्टमार्टम नहीं कराया जाना संदेह की ओर इशारा करता है। बेहद सामान्य घर से देश के शीर्ष नेता तक का सफर करने वाले स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहुादुर शास्त्री की संदेहास्पद मौ’त पर से राज जरूर हटना चाहिए। उनकी मौ’त पर रूसी कनेक्शन, उनके शव का रंग बदलना और शव का पोस्टमार्टम न किया जाना, ऐसे कई सवाल हैं जो उनकी मौ’त पर सवाल खड़े करते हैं।

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